Naak Kat Jaayegi! (नाक कट जायेगी!)

वो कहते हैं, ऐसा नहीं किया तो समाज में नाक कट जायेगी, वैसा नहीं किया तो समाज में नाक कट जायेगी|
में सोच रहा था, नाक तो आप कैसा भी करें काटने वाले लोग तो काट ही देंगे|
लोग उस्तरा लिए बाजार में फिरते रहते हैं इस ताक में की जैसे ही कोई दिखे उसकी नाक काट दें|
अच्छी लम्बी नाक आजकल लोग कहाँ रख पाते हैं?
वो कहते हैं, अच्छी लम्बी नाक रखना एक कला है, आपको पता होने चाहिए की लोग क्या चाहते हैं, बस वैसा करते रहिये, और आपकी नाक बची रहेगी| जिस वस्तु को अच्छी लम्बी नाक का आधार माना गया है उसे पाइए और और अपनी नाक बढाइये|
में यही सोच रहा था की या तो लोगों की नाक बहुत नरम हो गई है, या फिर काटने वालों का उस्तरा काफ़ी तेज़|
कपूर साहब का लड़का शादी के लायक हो गया था| इधर उधर वो बात चला रहे थे| घर में आने वाला नाइ भी रोज रोज एक ने लड़की की तस्वीर ले कर के आता था| कपूर साहब चाहते थे की लड़का किसी अमीर घराने में शादी करे, जिससे काफ़ी पैसा भी अपने पास आ जायेगा और समाज में नाक भी और लम्बी हो जायेगी|
उधर लड़के के कुछ अलग ही ख्वाब थे| उसके मन में पहले से ही कोई अप्सरा बसी हुई थी| वो उसके कॉलेज में ही पड़ती थी| दूसरे धर्मं की थी| लड़के को पता था की अगर उसने ये बात घर पर बता दी तो दंगे फसाद हो जायेंगे| काफ़ी दिनों तक वो इसलिए वो चुप रहा| पर अब जब उसकी शादी की बात घर पर होने लगी थी तो उसे डर लगने लगा की मुझे कहीं जबरदस्ती किसी ऐरी गैरी खूँटी से ना बाँध दिया जाए| तो उसने निर्णय लिया की वो घर पर सब सच सच बता देगा|
उसने काफ़ी दिनों तक हिम्मत जुटाने की कोशिश की और एक दिन जब उसे लगा की उसने पर्याप्त हिम्मत जुटा ली है तो उसने घर पर बता दिया| जिस बात का घर वालों वेशेशतः कपूर साहब को डर लगा, वह थी की अगर लड़के की शादी दूसरे धर्मं की लड़की से कर दी तो समाज में नाक कट जायेगी| लोग कहेंगे की कपूर साहब ने अपने लड़के को सही से लगाम लगा कर नहीं रखा| कपूर साहब ने लड़के के इस प्रस्ताव को पूरी तरह से ठुकरा दिया| लड़का भी लड़की के मोह में पागल था, वो भी अपनी बात पे अड़ गया की में अगर शादी करूँगा तो इस लड़की से ही करूँगा नहीं तो घर से भाग कर शादी कर लूंगा|
कपूर साहब को अपने दोस्तों से शादी के सिलसिले में की हुई बातें याद आ रही थी| वो हमेशा से ही अंतर्धर्मी शादियों के खिलाफ थे| उन्हें यही लग रहा था की जब मिश्रा साहब के लड़के ने इसी तरह दूसरे धर्म की लड़की से शादी की थी, तो वो आलोचना करने वाले लोगों में सबसे आगे थे, और अब अगर उनके ख़ुद के लड़के ने वोही कर दिया, तो लोग उनका जीना हराम कर देंगे| इस तरह की काफ़ी सारी बातें कपूर साहब को डराने लगी| पर दूसरी तरफ़ लड़के को संभाल पाना कपूर साहब के लिए मुश्किल हो रहा था| अंततः कपूर साहब अपनी बात पर अड़ गए और कहा, “मेरी अनुमति नहीं है इस शादी में”| लड़का कुछ नहीं बोला और वहाँ से चला गया|
दूसरे दिन लड़के का घर पर फ़ोन आया, उसने कहा, “मैंने कोर्ट में शादी कर ली है| अगर आप लोगों को स्वीकार हो तो में घर आ जाता हूँ, नहीं तो कहीं और जा कर रह लूंगा”|
लड़के की हिम्मत देख कर कपूर साहब के होश उड़ गए| कपूर साहब को ज्यादा चिंता इस बात की थी की अगर ये बात बाहर फ़ैल गई तो उनकी पूरी सोसायटी में नाक कट जायेगी| वो इस बात पर काफ़ी डर गए थे|
उन्होंने लड़के को कहा, “बेटा तू घर पर वापस आजा, हमें तू स्वीकार है!”
लड़के को अपने सुने पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, “इतने कट्टरवादी माता, पिता इतनी जल्दी कैसे मान सकते हैं” उसने मन में सोचा| फिर भी हिम्मत कर के लड़का घर पर पंहुचा|
सबने घर पर उसका काफ़ी स्वागत किया| लड़का हैरान था की हो क्या रहा है| उसे लगा की रातों रात ये काया पलट कैसे हो गया|
पिता ने लड़के के सामने प्रस्ताव रखा, “बेटा हम चाहते हैं की तू विधिवत हिंदू परम्परा के तहत शादी कर ले, और हम चाहते हैं की हम तेरी शादी काफ़ी धूम धाम से करें और सभी रिश्तेदारों को बुलाएं|”
लड़के को दुबारा से काफ़ी बड़ा झटका लगा| वो हैरान था ये सब देख कर| उसने अपने पिता को जो वो चाहते थे वो कर लेने की अनुमति देदी|
फिर हुई शादी काफ़ी धूम धाम से| सभी रिश्तेदारों, आस पडोसियों को बुलाया गया|
सभी लोग ये बात महसूस कर पा रहे थे की कपूर साहब की नाक कटी नहीं, बल्कि और लम्बी हो गई है|
सुनने में आया था की जिन लोगों से कपूर साहब की बात हुई शादी में उन्हें उन्होंने कहा, “भई देखिये मैं तो काफ़ी खुले विचारों वाला आदमी हूँ| अब लड़के ने अपनी इच्छा ज़ाहिर की और मैंने बिना कोई प्रश्न किए हाँ कर दिया| अब भई बच्चों की खुशी मैं ही तो हमारी खुशी है ना| अब ये धर्म वगेरह की कट्टरवादिता को हम कब तक ढोयेंगे|”
और इस तरह से कपूर साहब ने अपनी नाक को कट्ने से तो बचा ही लिया बल्कि और लंबा भी कर लिया|
घर पर अब ये आलम हैं, जब भी कपूर साहब अपनी दूसरे धर्म की बहू को देखते हैं तो उनकी आंखों मैं खून उतर आता है, पर अपनी लाचारी को वे अपने “खुले विचारों” से ढक लेते हैं|

Published in: on February 5, 2008 at 8:36 am Comments (3)

Moh (Attachment) (मोह)

शर्मा साहब का लड़का अभी IIT की प्रेपरेशन कर रहा था| पहले ही वो एक बार IIT का एक्साम दे चुका था, पर उसका हुआ नहीं था| ये उसका दूसरा साल था IIT की प्रेपरेशन का|
शर्मा साहब टेंशन में रहने लगे थे| उनको लड़के के भविष्य की काफ़ी चिंता रहती थी| काफ़ी पैसा पहले ही वो उसकी पढाई पे लगा चुके थे| आस पडोसियों के बच्चे सभी अच्छे अच्छे कॉलेजों में पड़ रहे थे| उन सब को देख कर शर्मा साहब की टेंशन और भी बढ जाती थी|
महेश्वरी साहब शर्मा साहब के अच्छे मित्र थे| उनकी एक छोटी बहन भी आजकल शहर में PET की प्रेपरेशन करने के लिए आई हुई थी| वो भी उनके साथ उनके ही घर में रहती थी| महेश्वरी साहब और शर्मा साहब के घर पास पास में ही थे|
एक दिन महेश्वरी साहब ने अपनी बहन को शर्मा साहब के लड़के से मिलने को भेज दिया| उन्होंने सोचा की दोनों एक ही तरह की तैयारी कर रहे हैं, मिल लेंगे तो एक दूसरे की मदद भी कर सकेंगे, और वो दोनों के लिए अच्छा रहेगा| उनके कहने पर उनकी बहन पिंकी शर्मा जी के लड़के बंटी से मिलने आ गई| बंटी उस समय घर पर अकेला था, शर्मा जी और उनकी धर्मपत्नी उस समय घर पर नहीं थे| बंटी के लिए ये एकदम नया अनुभव था| उसकी कभी किसी लड़की से बात नहीं हुई थी| शर्मा साहब बंटी को लेकर परेशान तो थे ही और वो उसे हमेशा लड़कियों से दूर रखते थे| उनका मानना था के अगर बंटी लड़कियों के कोंटेक्ट में आएगा तो भटक जायेगा, और पढाई में फिर उसका ज्यादा मन नहीं लगेगा| बचपन से ही बंटी को इसी तरह से ट्रेन किया गया था|
अब जब एक लड़की और वो भी एक काफ़ी सुंदर लड़की ख़ुद बंटी से मिलने के लिए आई हुई थी, तो वो काफ़ी उलझन में पड़ गया| उसे समझ नहीं आ रहा था के क्या किया जाए| उसके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था| काफ़ी देर तक वो एक दूसरे के सामने बैठे रहे पर बोले नहीं| लड़की सोच रही थी के में इसके घर पर आई हूँ और ये मुझसे कुछ बोल ही नहीं रहा! और उधर बंटी उलझन में था और उसे पिंकी से बात करने में काफ़ी शरम भी आ रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था के में क्या बात करूँ? करीब १५-२० मिनट तक जब बंटी कुछ नहीं बोला तो पिंकी उठ कर वापस अपने घर चली गई| पिंकी को बंटी का ये व्यवहार बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था| उसे समझ नहीं आ रहा था के बंटी ने ऐसा क्यों किया? उधर बंटी ये सोचकर परेशान था कि जाने पिंकी उसके बारे में क्या सोच रही होगी| ये सब जब हुआ तब बंटी कि छोटी बहन टीना घर पर ही थी, और बंटी के व्यवहार को देख रही थी|
थोडी देर बाद जब शर्मा जी और उनकी मिसेस बाजार से लौटे तो टीना ने बंटी के सामने अपनी मम्मी से कहा,
“मम्मी मम्मी आपको पता है, आज वो महेश्वरी अंकल कि छोटी बहन पिंकी अपने घर आई थी भइया से मिलने, और भइया है ना शरम के मारे कुछ उनके सामने बोल ही नहीं पाया| देखने लायक स्थिति थी भैय्या कि उस समय|”
बंटी ये सुनकर शरम के मारे पानी पानी हो गया| उसे अब और भी डर लग रहा था| वो सोच रहा था कि जाने मेरे मम्मी पापा मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे|
कुछ दिनों के बाद कोलोनी में एक पार्टी थी, जिसमे कोलोनी के सभी लोगों को बुलाया गया था| शर्मा साहब और महेश्वरी साहब को भी उसमें न्योता था| शर्मा साहब अपनी फैमिली के साथ वहां गए| महेश्वरी साहब भी वहां थे| बंटी अपनी बहन के साथ एक जगह बैठा हुआ था| तभी पिंकी भी उसके पास में आ कर बैठ गई और उससे बातें करने लगी| बंटी को अभी भी बहुत शरम आ रही थी| वो बस उसकी बातों का जवाब देता और चुप हो जाता| अपनी तरफ़ से उससे कोई बात नहीं करता था| ना उससे आँख मिला पाता था| पिंकी को अब भी उसका ये व्यवहार काफ़ी ख़राब लगा| वो बंटी कि हालत समझ नहीं पा रही थी| उसे लग रहा था कि बंटी उसे जानबूझकर बेइज्जत करने कि कोशिश कर रहा था| अब भी वो उसके पास से काफ़ी गुस्से में उठकर के चली गई|
फिर एक बार और वो शर्मा साहब के घर आई बंटी से कोई बुक मांगने के लिए| बंटी ने अब कि बार भी उससे कोई बात नहीं की पर उसको वो बुक दे दी| अब तक पिंकी का पारा काफ़ी चढ़ चुका था और इस बार और भी चढ़ गया| वो कुछ बोली नही बस बुक ले कर के वहां से चली गई|
इधर पिंकी ये सोच रही थी की ये लड़का काफ़ी अहंकारी है|
“मैं PET की प्रेपरेशन कर रही हूँ और वो IIT की प्रेपरेशन कर रहा है तो वो अपने को कुछ ज्यादा ही समझता है|” दिन पे दिन उसके अन्दर की यह भावना बलवती होती जा रही थी| उसने फिर निर्णय लिया की वो अब बंटी से मिलने नहीं जायेगी|
उधर बंटी के अलग ही आलम थे| बंटी अब तक की मुलाकातों से काफ़ी प्रभावित हो चुका था| खाते पीते उठते जागते उसे बस पिंकी ही पिंकी दिखाई देती थी| घर मैं जब भी घंटी बजती थी तो वो पहले अपने पढाई के कमरे से भागकर बाहर आ जाता था, इस आशा मैं की कहीं पिंकी तो नहीं आई! रात को अपने मुँह पर मलाई लगा के सोता था| अपने चेहरे और शरीर के प्रति काफ़ी संवेदनशील हो गया था| अपने मन मैं काफ़ी कुछ चित्रण किया करता था की जब अगली बार पिंकी मिलेगी तो ऐसे बात करूँगा वैसे बात करूँगा| उसकी पढाई मैं मदद करूँगा और जैसे हो सके उसे खुश करने का प्रयत्न करूँगा| दिन रत उसके इसी चित्रण और विचार मैं गुजरते थे| टेप रिकॉर्डर पर भी अब वो रोमांटिक गाने सुनाने लगा था|
एक दिन कोचिंग जाते समय वो दोनों सड़क पर एक दूसरे के सामने आ गए| बंटी उसे देखकर मुस्कुरा दिया| पिंकी के अन्दर जो पहले से ही बेइज्जती की आग जल रही थी, इस मुस्कुराहट ने उस आग पर केरोसीन डाल दिया था| पिंकी ने मन मैं ठान लिया की बस अब तो इस लड़के को मजा चखाना ही पड़ेगा|
कुछ दिनों के बाद कोलोनी मैं एक और पार्टी थी| बंटी काफ़ी खुश था उस पार्टी के बारे मैं सोच सोच कर| उसके दिमाग मैं पार्टी को लेकर काफ़ी चित्रण और विचार चल रहे थे, की मैं ऐसा करूँगा, वैसा करूँगा, ये कपड़े पहनूँगा, ऐसा व्यवहार करूँगा इत्यादि| पार्टी का दिन आ गया| बंटी पार्टी मैं गया और जा कर के एक कोने मैं अकेला बैठ गया ये सोच करके की अगर पिंकी आएगी तो उसके पास आ कर के बैठ जायेगी| और पिंकी आई| पर अब की बार वो अकेली नहीं थी, अपनी कुछ सहेलियों को साथ मैं ले कर आई थी| अपनी सहेलियों को वो लेकर बंटी के पास आकर बैठ गई| उसकी पूरी प्लानिंग थी की आज बंटी को बेइज्जत करेंगे| बंटी के पास मैं बैठ कर वो बंटी से बात नहीं कर रही थी| अपनी सहेलियों से ही बात कर रही थी और वो भी बंटी के व्यवहार के बारे मैं ही बिना बंटी का नाम लिए| बंटी की अप्रत्यक्ष रूप से उसने बंटी के ही सामने काफ़ी निंदा की, काफ़ी बेइज्जत किया| पूरी पार्टी मैं वो ये ही करती रही| बंटी को समझ नहीं आ रहा था की हो क्या रहा है| उसको कुछ अंदाजा ही नहीं था की उससे कुछ गलती भी हुई है| उसके हिसाब से तो उसने कुछ बुरा किया ही नहीं था| पार्टी के खत्म होने पर पिंकी और उसकी सहेलियां बंटी के पास मैं आ कर उस पर काफ़ी ठहाके लगा कर के हँसने लगे|
बंटी काफ़ी परेशान था| उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था| काफ़ी दिनों तक वो येही सोचता रहा की हो क्या रहा है| उसके मन मैं ये उलझन इतनी बड़ी गई थी की उसका पढाई मैं भी मन नहीं लग पा रहा था| मम्मी पापा से तो वो इस बारे मैं बात करने की सोच भी नहीं सकता था| करीब रोज ही वो सर दर्द की दवाई खा कर के सोता था| बहुत सोचने पर जब उसे समझ मैं आया की ये सब उसकी ही नासमझी के कारण हुआ तो, उसे येही लगा की इतनी सी गलती की मुझे इतनी बड़ी सजा क्यों दी गई| और धीरे धीरे उसका पिंकी के प्रति मोह घृणा मैं बदल गया| वो इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था की उसको इस तरह से बेइज्जत किया गया इतनी सी नासमझी के कारण|
उधर शर्मा साहब और उनकी धर्मपत्नी भी लड़के के व्यवहार और कार्य को देखकर परेशान थे| उन्हें लग रहा था की लड़का जाने IIT मैं क्या करेगा| IIT का एक्साम पास आ गया था| उसने एक्साम दिया, उसकी IIT मैं पीछे रेंक आई और उसे लोकल इंजीनियरिंग कॉलेज मैं भारती कराया गया|
शर्मा साहब लड़के से काफ़ी नाराज़ थे और लड़का अपने आप से|
मैं येही सोच रहा था की किस तरह से ये मोह आदमी मैं उत्पन्न होता है और दुःख देता है| आदमी जब व्यक्ति मैं सुख की निरंतरता खोजता है तो मोह मैं बंध जाता है, और दुखी होता है| किस तरह से ये राग, मोह और द्वेष इंसान को अपने से घेरे रहते हैं| इसमें भी जरूर ही कुछ समझ का आभाव ही होगा|

Published in: on January 30, 2008 at 6:42 am Comments (2)

Ye Zindagi Hai!

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Apni to jaise taise
Thodi aise ya waise
Apni to jaise taise
Thodi aise ya waise
Kat jaayegi
Aapka kya hoga janaabe-aali
Aapka kya hoga 

Apne aage na peeche
Na koi upar neeche
Apne aage na peeche
Na koi upar neeche
Ronewala
Na koi ronewali janaabe-aali
Aapka kya hoga 

Aap bhi meri tarah insaan ki aaulad hain
Aap mooh mangi dua
Hum unsooni faryaad hain 

Aap bhi meri tarah insaan ki aaulad hain
Aap mooh mangi dua
Hum unsooni faryaad hain
Woh jinhe sara zamana samjhe laawaris yahan
Aap jaise zaalimon ke zulm ki ijaat hain
Gaali huzur ki to
Lagti duaon jaisi
Gaali huzur ki to
Lagti duaon jaisi
Hum dua bhi de to lage hai gaali
Aapka kya hoga janaabe-aali
Aapka kya hoga hm 

Aapke maathe se chhalke jo pasina bhi kahin
Aasma hilne lage aur kaap oothe yeh zameen
Aapka to yeh pasina khoon se bhi keemti
Aur apne khoon ki keemat yahan kuch bhi nahin
Apna to khoon paani
Jeena marna bemaani
Apna to khoon paani
Jeena marna bemaani
Waqt ki har ada hai apni dekhi bhali
Aapka kya hoga janaabe-aali
Aapka kya hoga 

Haan apni to jaise taise
Thodi aise ya waise
Apni to jaise taise
Thodi aise ya waise
Kat jaayegi
Aapka kya hoga janaabe-aali
Aapka kya hoga 

Apne aage na peeche
Na koi upar neeche
Apne aage na peeche
Na koi upar neeche
Ronewala
Na koi ronewali janaabe-aali
Aapka kya hoga
Published in: on January 29, 2008 at 4:29 am Comments (2)

Baajaar (बाजार)

पहले बाजार में टमाटर, बैंगन बिका करते थे,
आजकल वहां पर लोग बिका करते हैं!
मिश्रा जी के यहाँ पर लड़का हुआ|
मिश्रा जी ने कहा, “में इसे किसी बड़ी कंपनी का मेनेजर बनाऊंगा”|
मैंने पूछा, “क्यों?”
तो कहा, “आजकल मेनेजर बहुत कमाते हैं और सोसायटी में उनकी काफ़ी इज्जत होती है| आजकल महंगाई का जमाना है, प्रक्टिकल हो कर के जीना पड़ता है, भविष्य में सिक्यूरिटी भी तो चाहिए की नहीं?”
मैंने कहा, “ठीक है देखते हैं|”
लड़के को उन्होंने ३ साल का होने पर एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में भरती करा दिया|
मैंने कहा, “आपके घर में तो हिन्दी बोली जाती है, फिर आपने अपने लड़के को इंग्लिश मीडियम स्कूल में भरती क्यों करदिया? प्राथमिक शिक्षा तो मातृभाषा में ही होनी चाहिए, नहीं तो बच्चे को समझने में कठनाई होगी, और बच्चा सब रट लेगा, समझेगा नहीं, उसमें बच्चा भी खुश नहीं रहेगा!”
मिश्रा जी ने कहा, “ये सब बेकार की बातें हैं, इंग्लिश के बिना आजकल कुछ नहीं होता| बाद में जब ये नौकरी करेगा तो इंग्लिश में ही तो इसे बोलना होगा! और आजकल इंग्लिश के बिना कोई नौकरी नहीं देता| प्रेक्टिकल हो कर के जीना होता है इस संसार में!”
मैंने कहा, “ठीक है देखते हैं!”
एक दिन जब में उनके यहाँ पर पंहुचा तो वो बंटी को जमकर फटकार लगा रहे थे|
मैंने पूछा, “क्या हुआ क्यों डांट रहे हो लड़के को?”
तो बताया की उसके एक्जाम में नंबर कम आए थे|
मैंने कहा, “अरे ये तो जानने की कोशिश कीजिये की नंबर कम आए क्यों?”
तो बोले, “इसमें जानना क्या है, दिनभर मस्ती मारता रहता है, जब पड़ने का बोलो तो इसे मक्कारी सूझती है| मन वन थोड़े ही लगता है इसका पढाई में, इससे तो बस मस्ती करवा लो| सिन्सयरिटी तो इसमें है ही नहीं| मेरे माँ बाप ने भी मुझे मार मार कर पढाया था, लगता है मुझे भी इसके साथ यही करना होगा|
इसको समझ में आता नहीं है की आजकल नौकरी पाना कितना कठिन है| आज जिसके पास पैसा है उसकी ही पूछ है, उसके ही संबंध हैं, और वही सुखी है| पैसे के बिना कुछ नहीं होता आजकल| भाई भाई के काम नहीं आता, बेटा बाप के काम नहीं आता|”
मुझे आश्चर्य हो रहा था जिस तरह से वो बंटी के सामने ये सब बोल रहे थे|
पर मैं उनको उस समय समझाने में असमर्थ था, तो वहां से वापस चला आया|
लड़के से मेरी एक दिन अलग से बात हुई तो बोल रहा था,
“ज्यादा मन नहीं लगता मेरा पढाई मैं, बहुत रटना पड़ता है| पर अब क्या करें …”
उसकी बातों मैं मुझे विद्रोह की बदबू आ रही थी|
कुछ सालों के बाद जब लड़के ने दसवी पास कर ली, तब उसका मन आर्ट्स लेने का था| पर मिश्रा जी ने जबस्दास्ती उसे मेथ्स दिलवा दी| मेनेजर जो बनाना था| उनका प्लान था की, लड़के को पहले इंजीनियरिंग कराएँगे फिर “ऍम बी ऐ” कर कर किस्सी कंपनी का मेनेजर बनायेंगे|
लड़का अब घर को छोड़ कर जाए भी कहाँ, और जिस तरह से उसे आर्ट्स के खिलाफ डराया गया था, उसी भी लगा की आर्ट्स लेने बाद आगे कोई फ्यूचर नहीं है| तो उसने मन मानकर मेथ्स ले ली|
मेथ्स के साथ में उसे फिजिक्स और केमेस्ट्री भी पड़ना पड़ता था| आई आई टी का एक्जाम उससे दिलवाया गया| आई आई टी में उसका सेलेक्शन भी हो गया| उसका मन अब “एम् एस सी फिजिक्स” करने को था| लड़के को फिजिक्स में इन्टरेस्ट आने लगा था| पर मिश्रा जी ने उसे जबरदस्ती कंप्यूटर साइंस दिलवा दी|
कहा, “ये फिजिक्स वगेरह में कोई फ्यूचर नहीं है| आगे मेनेजर बनाना है तो कंप्यूटर साइंस एक सीडी है| आजकल टेक्नोमेनेजर की काफ़ी मांग है|”
लड़के ने फिर से अपने मन को मारकर कंप्यूटर साइंस ले ली| और कर भी क्या सकता था| उसकी सुनाने वाला था कौन?
लड़के ने कॉलेज ज्वाइन कर लिया| कॉलेज के तीसरे साल में पता लगा की लड़के का किसी क्रिश्चियन लड़की के साथ चक्कर चल रहा है| मिश्रा जी को पता चलते है वो आग बबूला हो गए|
लड़के को एक दिन फ़ोन लगा हजारों गलियां सुना डाली, और उस लड़की से दूर हो जाने को कहा|
लड़के ने काफ़ी समझाने की कोशिश की, कि ऐसी कोई बात नहीं है, वो बस उसकी फ्रेंड है|
पर अपने लडके की किसी दूसरे धर्म की लड़की की संगत मिश्रा जी जो बर्दाश्त ना थी, तो उन्होंने उसे उस लड़की से दूर हो जाने के लिए काफ़ी डराया धमकाया| लड़का कुछ ना बोला, और उसने उससे बात कम कर दी, पर तब भी कभी कभी कर लिया करता था, जिसका मिश्रा जी को पता ना था|
लड़के के कॉलेज में प्लेसमेंट्स चालू हो गए थे| लड़का प्लेसमेंट्स में बैठा और उसका किसी कंपनी में ४०,००० रुपये का जॉब लग गया| मिश्रा जी काफ़ी खुश थे|
जॉब लगने के एक साल बाद मिश्रा जी ने उससे कहा की अब “एम् बी ऐ” की तयारी चालू कर दे| मिश्रा जी उसे मेनेजर जो देखना चाहते थे| पर इस बार लड़के ने मना कर दिया| वो “एम् बी ऐ” नहीं करना चाहता था| और तो और उसने उस क्रिश्चियन लड़की से अपनी शादी का फैसला भी सुना दिया|
ऐसा लग रहा था की, पूरी उमर से जो ज्वालामुखी लड़के के अन्दर पनप रहा था, वो आज फट गया था| पहले तो वो लाचार था| अपने माँ बाप पर आश्रित था, पर अब उसे कौन रोक सकता था| ख़ुद अपना काफ़ी कमा लेता था, और स्वावलम्बी हो गया था|
मिश्रा जी ने शादी का फैसला सुनकर लड़के को घर से निकल जाने को कहा| लड़का घर से चला गया|
उसने शादी कर ली, और अब दूसरे शहर में रहता है|
मिश्रा जी की धर्मपत्नी कहती हैं, “जाने कौन डायन है वो, जिसने हमारे भोले भले बंटी को फाँस लिया! पूरी जिंदगी भर चूं भी नहीं बोला हमारे सामने और आज .. ये सब जरूर उस कुलटा का ही सिखाया हुआ होगा|”
में यही सोच रहा था, बोलना तो वो चाहता था पहले भी, पर सुनने वाला कोई नहीं था|
दोनों घरों में बात नहीं होती| सुनाने में आया था की अब वो बाप भी बन गया है| उनके यहाँ कुछ महीने पहले ही एक लड़का हुआ है|
ये ख़बर सुनते ही मुझे लगा की चलो अच्छा ही हुआ, शायद बंटी इतने अनुभव झेलने के बाद अपने लड़के को तो इस बाजार की बलि नहीं चड़ने देगा जिसकी वो ख़ुद चड़ा|
पहले ही मेरी आंखों के सामने एक घर तो इस बाजार में बिक ही चुका था|

Published in: on January 23, 2008 at 9:10 am Comments (6)

Ladki ki Shaadi (लड़की की शादी..) ..

गुप्ता जी के यहाँ पर लड़की हुई
और उनकी चिंताओं में बढ़ोतरी भी हुई|
उनका पहले से एक लड़का तो था ही
गुप्ता जी तो अब भी एक लड़के की ही आशा लगाये हुए थे,
पर अब क्या करें,
भगवान की इच्छा समझ कर गुप्ता जी ने इसे भी स्वीकार लिया|
लड़की के पैदा होते ही
गुप्ता जी अपने आप को जिम्मेदारियों मे दबा पाया|
उसकी शादी का खर्चा,
पढाई का खर्चा, और फिर एक दिन,
सब किसी और के घर!
पर अब क्या करें,
करना तो पड़ेगा ही|
सरकारी नौकरी मे आजकल बड़े शहरों मे कहाँ काम चलता है,
बस गुज़र बसर ही हो पाता है!
ऐसे म ऊंची सोसायटी मे लड़की की शादी कैसे हो?
अगर लड़की की शादी अच्छे से नहीं की तो पूरी सोसायटी मे नाक कट जायेगी|
गुप्ता ज के दिमाग मे आया
एक लड़का तो है ही
उसकी शादी मे अच्छा खासा दहेज़ तो आ ही जायेगा
उससे लड़की की शादी मे कुछ मदद हो जायेगी
और अपना एक सुंदर बंगला भी बन जायेगा!
पर फिर लगा की वो भी शायद पूरा नहीं पड़ेगा,
बड़े शहरों मे घरों के दाम बहुत बढ गए हैं,
काफ़ी पैसा चाहिए होगा!
फिर गुप्ता जी के दिमाग मे आया,
अपनी सरकारी नौकरी मे ऊपर नीचे से पैसा कमाने के काफ़ी तरीके हैं,
क्यों ना उनका ही सदुपयोग किया जाए!
देखते ही देखते गुप्ता जी की आमदनी डबल हो गई|
और गुप्ता जी के घर और लड़की के शादी के सपनों ने भी
और प्रचंड रूप धारण कर लिया|
और दूसरी तरफ़ लड़के की शादी की उमर हो आई थी,
उसके चाल चलन कुछ ज्यादा अच्छे नहीं लग रहे थे,
कुछ स्वतंत्रता सेनानियों के साथ लड़का रहने लगा था,
गुप्ता जी को भी डर लगाने लगा था की लड़का जाने क्या करेगा|
तो एक दिन डायरेक्ट पूछ लिया,
“शादी का क्या प्लान है तेरा?”
तो लड़के ने कहा,
“शादी तो मे कर लूंगा पर दहेज़ नहीं लेने दूँगा”|
गुप्ता के सारे अरमान मिटटी मे मिलने को आ गए,
“लड़की की शादी कैसे होगी फिर?” गुप्ता जी ने प्रश्न उठाया ..
“हम उसकी शादी मे भी कुछ नहीं देंगे” लड़के ने कहा ..
“पर ऐसा लड़का मिलेगा कहाँ?” गुप्ता जी ने गुस्से मे कहा ..
“नहीं मिलेगा तो नहीं करेगी शादी” लड़के ने जवाब दिया …
होश उड़ गए गुप्ता जी के ये सुनकर …
उन्हें लगा लड़का तो हाथ से गया|
अब उनकी चिंताएँ और भी बढ रही थी,
एक तरफ़ नालायक लड़का,
दूसरी तरफ़ कुंवारी लड़की!
लड़की की शादी मे पैसा नहीं लगाया,
तो सारे रिश्तेदार थू थू करेंगे,
और सोसायटी मे उठाने बैठने लायक भी नहीं रहेंगे,
ऐसा सोचकर गुप्ता जी ने अपनी पुश्तैनी जमीन बेच दी,
और बैंक से लोन ले लिया,
और खूब बड़े स्तर पर फंक्शन किया|
शादी मे “डी जे” लगवाया,
१० तरह की काजू बादाम की बर्फियाँ बनवाई,
और खूब धूम धाम से शादी करवाई|
रिश्तेदारों और आस पडोसियों ने
खूब वाह वाही की, सभी बहुत खुश हुए|
आज लड़की की शादी के दस साल बाद भी
गुप्ता जी लोन पूरा नहीं चुका पाये|
आधी तनख्वाह लोन मे चली जाती है,
बाकी मे घर का पूरा खर्च भी नहीं निकल पाता|
दफ्तर के काम मे मशीनीकरण हो जाने के कारण
ऊपर नीचे की कमाई भी अब नहीं हो पाती|
परेशान हो कर उन्होंने अपना घर भी बेच दिया
और अब किराये के घर मे रहते हैं|
लड़का बस इतना ही कमा पाता है की बस अपना खर्चा ख़ुद उठा ले|
और रिश्तेदार और आस पड़ोसी कहते हैं,
“काहे को की थी लड़की की शादी इतने धूम धाम से,
किसने कहा था झूंटी शान दिखाने को?
किसने कहा था, इतना पैसा लगाने को?”
ये सुनकर गुप्ता जी की छाती पर साँप लोट जाते हैं,
“इन्ही रिश्तेदारों और आस पडोसियों को खुश रखने को,
और इन लोगों मे अपनी नाक बचाए रखने के लिए ही तो मैंने
इतना पैसा लगाया था,
और आज ये ही!!!”
धीरे धीरे रिश्तेदारों और आस पडोसियों
ने भी गुप्ता जी के फटे हाल देख कर उनसे मुहँ मोड़ लिया|
और अंत मे गुप्ता जी अपनी नाक नहीं बचा पाये|
आज गुप्ता जी अपनी किस्मत को कोस कर रोते हैं,
खुशी की कोई आशा उन्हें नहीं दिखती,
बैंक का लोन, रोजमर्रा का खर्चा,
मेट्रो शहर मे किराये का घर,
और ये सरकारी नौकरी!

Published in: on January 21, 2008 at 5:30 am Comments (9)

मरना क्या है?

जब में छोटा था,
बहुत मस्ती किया करता था|
लगता था, यही जीना है|
बहुत सवाल जवाब किया करता था,
लगता था यही जीना है|
बहुत खुश रहा करता था,
लगता था यही जीना है|
फिर आ गए स्कूल में,
अध्यापक ने कहा,
माँ बाप ने भी कहा
सफल होना ही जीना है,
मान लिए उसे बिना सवाल किए,
क्लास में फर्स्ट आना जीना मान लिए,
लाते रहे नम्बर, जीते रहे वैसे ही,
पर कहीं कुछ कमी लगती थी,
नम्बर ला ला कर मन ऊब गया था,
पढने को ज्यादा मन नहीं करता था,
तो एक दिन माँ को कह दिया,
“में नहीं पढूंगा कल से
मन नहीं लगता मेरा पढाई में”
तो माँ ने कहा,
“पढाई किसको अच्छी लगाती है बेटा
पर करनी तो पड़ती ही है,
तू भी कर ले,
सफल होने के लिए पढाई करना जरूरी है”
तो करते रहे पढाई,
पढते रहे वो सब,
बिना जाने क्यों पड़ रहे हैं,
रटते रहे दिन रात,
लाते रहे नम्बर|
माँ बाप कहते थे,
बस दसवी पास कर ले,
फिर जीवन आसान हो जायेगा,
रट रट कर पास कर ली दसवी,
पर जीवन आसान नहीं हुआ|
फिर कहा बस आई आई टी पास कर ले,
फिर जीवन आसान हो जायेगा,
लग गए आई आई टी की रटाई में,
समझ लिया कुछ कुछ,
जो समझ नहीं आया, रट लिया,
दे आए एक्जाम,
नहीं हुआ आई आई टी में,
एक साल और रूककर पढाई की,
फिर आई पीछे रेंक आई आई टी में,
तों आ गए ट्रिपल आई टी में,
तब लगा अब लाइफ आसान हो जायेगी,
पर माँ बाप ने कहा,
बस पड़ ले ये 4 साल और फिर लाइफ आसान हो जायेगी,
ऊब चुका था में ये सुन सुन कर,
पर नौकरी के लिए मुझे पड़ना तों था ही,
फ़ैल ना हो जाएँ,
पढते रहे इस डर से,
मान लिए थे की नौकरी पा कर,
लाइफ आसान हो जायेगी,
गुजार लिए वो चार साल भी,
रट रट कर,
आ गए नौकरी में,
पर लाइफ आसान नहीं हुई,
अब वो कहते हैं,
MBA कर ले बेटा,
आजकल उसका बहुत चलन है,
उसके बाद बस मजे ही मजे,
पर नहीं मानने को मन करता उनकी बातें अब,
सफलता की परिभाषा हर बार बदल जाती है,
एक चीज़ पा लो,
तों कुछ और सफलता कहलाई जाने लगाती है,
वो कहते हैं,
सफलता एक यात्रा है, अंत नहीं,
अगर ऐसा है,
तों में यही कहूँगा की उस यात्रा में सुख नहीं,
सुख के बिना मजा नहीं,
मजे के बिना जीना नहीं,
अगर यही जीना है यारों,
तों मरना क्या है?

Published in: on January 14, 2008 at 6:26 am Comments (10)

This Diwali, let’s Measure the true Cost of Celebration!

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Published in: on November 4, 2007 at 4:08 pm Comments (5)

The Body-Chariot Analogy

In this analogy, our Body is considered to be analogous to a chariot.

Our Body is the chariot,

Our Senses are the horses,

Reins controlling the horses, is the “Mann”,

These Reins are in the hands of “Buddhi” i.e the driver,

We are the one in the chariot, i.e. the “Swami”

Body Chariot Analogy

If Buddhi is not appropriate i.e if the understanding is not proper then the Reins (Mann ) will not be in control. If Reins (Mann) are not taut i.e not in control, then the horses (senses) will be out of control, which will end up taking the chariot along with the Swami nowhere.

In fact it is the Buddhi (driver) keeps on teaching the Swami. Swami is the one who is the decision maker. If it is according to the knowledge given by Buddhi then it is fine otherwise we end up ending nowhere.

Published in: on June 8, 2007 at 1:34 pm Leave a Comment

The Canker of UnTruth …

It was a train journey from Indore to Kota, my home place. Just two days back before the journey, I requested my uncle to get me a train ticket; he got me a sleeper class ticket with a waiting number of 53. We thought it would clear. In this hope, came the day of leaving. I inquired to railway inquiry, and found that there was still a big waiting. I told my uncle to cancel my train ticket and get me a bus ticket instead, but he said, “don’t worry, I will settle you the train, be patient and just see!!”. I was wondering how he will do that. On my repeatedly asking the same question he got irritated and shouted, “it is my responsibility to get you into the train, don’t worry, and don’t ask me this question again.”. I did not touch the topic again. Time of departure of train was approaching; I packed my luggage and got ready. We left to the railway station. After reaching there we checked for my waiting list number, it was 10. My uncle then started searching for TC. He asked to TC, if I could get one seat. He said, there is no seat available in sleeper coach. He then asked if there is seat available in AC coach, TC said “just go and sit on seat number 7, which is my seat, rest I will see in the train itself”.

I was afraid with all this; I was not ready to do all this. Many questions were revolving in my head, “what if … ??”. The main fear which I had in my mind was of fear of indulging in bribery, which I was not at all willing to do. I repeated asked few questions to my uncle, “How can I sit in AC coach with a sleeper class ticket? and even if there is some legal mechanism to do this, then what is the surety that he will not ask me for some money for his pocket?”. To this he said, “There exists a legal mechanism to upgrade a sleeper class ticket to AC coach, depending upon the availability of seat, but even then if he asks you for some money then, give it to him!!” I was not willing to indulge into this. In spite of my unwillingness they put my luggage into AC coach onto the seat number 7 and told me, “You are very impractical; you are unfit to survive in this world”. I kept quite, due to regard as he is elder to me.

And the time of departure came, train started moving; I was waving my hand on the gate of my coach and was saying bye-bye to all. I sat on seat number 7 in AC coach as said by TC. I still had fear and many questions were still revolving my mind, “what if …??”. What if some other TC comes? What if there is no legal mechanism to upgrade the ticket? What if TC asks me for some money? If he asks me for some money then how will I handle that situation? All these questions were revolving in my mind.

I was asynchronously monitoring if TC was coming, I couldn’t even concentrate much on the book I was reading. I was thinking to shift to general coach but I had a lot of luggage which I couldn’t shift in little time. I was cursing myself that I brought that much luggage and decided to not to carry more that 2 luggage in any journey in future.

Ultimately, I saw TC coming. I took my ticket out of my pocket and when he came I showed it to him. He told me to keep the ticket with me and wait for some time. May be he did not have any free seat till then. It happened 3-4 times, every time he was coming near to me, I was showing him the ticket and getting the same reply, “keep the ticket with you for some more time.” After some time he came back and told me to show him my ticket. I showed, he then took out his booklet to upgrade my ticket. He made a slip of Rs. 310 and allotted me a free seat. I was not expecting this; I thought he will ask me for some money without giving me any slip. I gave him 500 rupee note since I did not have change. He was supposed to return me 190 Rs. He went away without returning. I too did not ask him the change with the belief that he will return me change in some time and might not be having it that time.

He came back after some time sat next to me, took out money from his pocket, confirmed from me, “You gave me 500 Rs, right?”, “Yes” I said. He gave me 100 Rs back and very slowly said something to me with a mild sarcastic smile on his face. I couldn’t exactly hear what he said but I could understand that he was expecting me to leave 90 Rs. I said “I think I have some change”, I took out 10 Rs note out of my pocket, gave him, and raised my hand in the expectation of 100 Rs. He returned me 100 Rs unwillingly and was expecting me to give him 50 Rs or something. He did not explicitly ask me that but I could figure it out from his gesture. I did not give him anything. Without saying anything, I kept 200 Rs in my pocket and ignored him. May be he understood and did not ask me for money then. All the people around me were awake so may be, he was not willing to do that explicitly in front of all of them.

I was feeling secure now. I had got an AC coach legal ticket. All my fears had gone except the fear, what if he comes again sometime later and asks me for some money? How will I handle that situation? I started imagining that situation in my mind and was trying to find out the solution for it. I decided that if he asks me for money sometime later then I will refuse him humbly with gratefulness for allotting me seat in AC coach.

He did not come for a long time. Kota was approaching us, only 30-45 minutes were remaining. TC came back and sat next to me. He was also going to get down at Kota. Again same questions started revolving in my mind and I started revising what I had decided in my mind. But by God’s grace that situation did not come. He did not ask me anything and Kota came. I was now fearless and happy. I was happy that I was saved from the thing which I was not willing to do. But during these ending hours I saw him taking money from some other people, when all were almost asleep.

There are some more things in it. What if he would have asked me for money without giving me any slip? What if I had refused to give him money? What he could have done? If he had asked me to leave the coach or had charged me fine for boarding into the AC coach in spite of his instructions, since I did not have any proof that he gave me instructions, then what would have happened? I was with 5 big bags which I feel was difficult for me to change the coach on any station since the train was not stopping on any station for more that 10 minutes.

In this entire thing first mistake was mine. I shouldn’t have boarded the AC coach in spite of the TC’s instructions. I should have completed the formalities on the station itself, then only I should have boarded. But I feel he did not have any free seat that time in AC coach and there was pressure from my uncle’s side on me to board it. In this situation when I had already boarded the AC coach, if he had asked me for money, then I would have definitely refused humbly, but if he had insisted then probably I would have given him the money. I know that it wouldn’t have been right, but I was in such a situation that I wouldn’t have had any other option.

There have been many times in past, when I did things which now I feel were wrong. There were many wrong things which I did, out of ignorance i.e. without knowing that what I was doing could be wrong, out of need and having no option other than doing what I feel was wrong, out of fear I did things which I was not willing to do and sometimes even out of greed and temptation, in spite of knowing that what I was doing was wrong.

What I feel today is, what I know could be wrong, but yes I feel that is the Truth for me today. I will make it base for my action. Yes it is possible that tomorrow the Truth changes for me, then the new version of Truth will become basis of my action. I will try to refrain myself from temptations and greed which I feel could only be avoided with more understanding and for fear it will require more courage and knowledge.

Published in: on May 17, 2007 at 9:43 am Comments (12)

God’s Creation !!

It is said that God Almighty wanted

to create the best creation. He worked for

millions of years, designing and evolving

the image. He went on looking at the image,

improving it and finally decided to give it life.

As soon as the image of the man got life, two

things happened. First, he opened his eyes and

smiled. God was very happy. The second, he

opened his mouth and said, “Almighty, thank

you.” God was delighted to see His creation

and felt that he did the two right things.

Suddenly, God found that something was

missing in the man. He then created fire in

a flash of a second, out of which came the

Shaitan, who said, “God, you took millions

of years to create the man, but you created

me out of fire in a flash of a second. So I am

the best.” The Almighty who had created the

universe with mighty orbiting galaxies with

the outburst of Shaitan. He had created the

best of his creation, the man on one side, and

on the other side, the Shaitan. He thought of

it and looked at both with the benevolence and

integrated the man and Shaitan and gave the

following message:

“I have created the human being with brain

and thinking faculty. I command all My

creations to use your faculty with reasoning to

reach My Image.”

As Rumi, the Turkish Sufi poet, wrote:

Angel is free because of his knowledge,

The beast because of his ignorance,

Between the two remains the son of man to stuggle.

Published in: on January 27, 2007 at 6:28 pm Leave a Comment