काल्पनिक भय

एक दिन एक लोकल बस ड्राईवर बस को लेकर अपने निर्धारित रस्ते से गुज़र रहा था| रस्ते से गुज़रते हुए उसने बस को एक बस स्टाप पर रोका| वहां पर बस में एक हट्टा कट्टा ६ फुटिया पहलवान बस में चढ़ा| बस ड्राईवर ने उससे टिकट लेने का अनुरोध किया, इस पर पहलवान ने कहा, “पहलवान टिकट नहीं खरीदता”| यह सुनकर बस ड्राईवर घबरा गया और उसने पहलवान को फ़िर कुछ नहीं कहा| उसने पहलवान को बिना टिकट ही यात्रा करने दी|
दूसरे दिन फ़िर ड्राईवर जब अपने निर्धारित रस्ते से गुज़र रहा था तब फ़िर से वह पहलवान उस बस स्टाप से बस में चढा| टिकट लेने का अनुरोध किए जाने पर उसने फ़िर से वही जवाब दिया, “पहलवान टिकट नहीं लेता”| बस ड्राईवर फ़िर से घबरा गया और फ़िर से उसने उस पहलवान को बिना टिकट यात्रा करने दी| हर दिन ऐसा ही चलता रहा| देखते ही देखते २ महीने निकल गए और वह पहलवान बिना टिकट ही यात्रा करता रहा|
अब यह बस ड्राईवर से सहन नहीं होता था| बस ड्राईवर ने भी ठान ली की मैं इस पहलवान को सबक सिखा के ही रहूँगा| उसने फ़िर अपने सारे प्रयत्न अपने शरीर को और ताकतवर बनाने मे लगा दिए| रोज सुबह उठकर बहुत कसरत किया करता था| अब उसने कराटे क्लास भी ज्वाइन कर ली थी| ४ महीने के निरंतर अथक प्रयास के बाद जब उसे लगा की अब मैं उस पहलवान को टक्कर देने का सामर्थ्य हासिल कर चुका हूँ तो उसने वापस से बस चलाने का निर्णय लिया|
अब वह वापस से दूसरे दिन बस को उसी रस्ते से ले कर गया| वह पहलवान आदमी वहा से बस मे चढा| बस ड्राईवर ने अब की बार उससे गुस्से में कहा, “अरे ओ पहलवान की औलाद, ये ले तेरा टिकट”| पहलवान ने फ़िर वही कहा, “पहलवान टिकट नहीं खरीदता”| यह सुनकर ड्राईवर ने बस रोक दी और अपनी बुशर्ट की आस्तीन ऊपर कर के बोला, “ऐसे कैसे नहीं खरीदेगा टिकट”, तो इस पर पहलवान ने जवाब दिया, “पहलवान टिकट इसलिए नहीं खरीदेगा क्यूंकि उसके पास बसपास है”!

अगर हम ध्यान से देखें तो हमारे संबंधों में जो हम कई तरह के तनाव महसूस करते हैं, उनमें से आधे से ज्यादा तनाव हमारी उलटी सीधी कल्पनाओं के ही कारण रहते हैं| हम दूसरे व्यक्ति के बारे में कुछ भी मान लेते हैं, कुछ भी कल्पना कर लेते हैं और या तो उस कल्पना के आधार पर, उत्साहित होने लगते हैं या फ़िर भयभीत| उसी कलपना के आधार पर हम दूसरे व्यक्ति के साथ व्यवहार करने लगते हैं| दूसरे व्यक्ति के बारे में मेरे अन्दर बनी हुई कल्पना, मेरी आंखों पर एक रंगीन चश्मा लग जाने जैसा होता है| अब उस दूसरे व्यक्ति की हर गतिविधि मुझे रंगीन ही दिखाई देती है| अब भाई लाल रंग का चश्मा लगा कर देखेंगे तो दुनिया लाल ही दिखाई देगी न! यहाँ तक की हम दूसरे व्यक्ति से पूछने की भी चेष्ठा नहीं करते की असलियत क्या है और बस अपने आप को ही सही माने रहते हैं| संबंधों में इस तरह के संवाद की कमी के कारण हम कई तरह के तनाव महसूस करते हैं| यह तनाव धीरे धीरे जलन, घृणा, इर्ष्या, इत्यादि का रूप ले लेती है और हमें पता भी नहीं चलता| जब तक हमें पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, और यह सब हमारे दुखों का कारण बनता है|

Published in:  on September 30, 2008 at 9:44 am Leave a Comment

आम कहाँ है?

एक बार एक आदमी पानी पीने के लिए एक नदी के किनारे जाता है| नदी के किनारे एक आम का पेड़ था, जिसका प्रतिबिम्ब पानी पर पड़ रहा था| जब वह आदमी पानी के पास पहुचता है तो उसे पानी में आम के पेड़ पर लगे हुए आमों की परछाई दिखाई देती है| वो आदमी उन आमों की परछाई को ही आम मान लेता है और उसे पाने के लिए पानी में कूद जाता है| एक किनारे से दूसरे किनारे, यहाँ से वहां, ज्यादा से ज्यादा गहरा तक उतर जाता है, पर उसे आम नहीं मिलता! आम ना मिल पाने के कारण वह अपने सामर्थ्य पर शंका करने लगता है और फिर उसे लगता है को इस आम को पाने के लिए मुझे अपने बल व सामर्थ्य को बढाना होगा, तो वह कई तरह के यन्त्र उपकरणों का आविष्कार करता है, कई तरह को नावें, जहाज, पन्दुब्बियाँ इत्यादि बना लेता है| लगा ही रहता है, पर उसे आम नहीं मिलता| तो वह और भी कई लोगों को उन आमों के बारे में बताता है, वे लोग भी उसके साथ उस आमों को पानी में से निकालने के लिए तत्पर हो उठते हैं और अपने सारे प्रयास उन आमों को पाने के लिए लगाने लगते हैं|
साथ ही साथ कई और तरह को गतिविधियाँ भी समाज में होने लगती हैं| कई तरह को बैठकें, सभाएं होने लगती हैं, जिनमें चर्चा का विषय होता है, “पानी में से आम कैसे निकालें”| कई तरह की पुस्तकें छपने लगती हैं, जो लोगो का उत्साहवर्धन करने का काम करती हैं, पानी में से आम निकालने के लिए लोगों को प्रेरित करती हैं| “पानी में से आम निकालने के ७ तरीके”, “आज ही अपना आम पाइए”, “आम ही सब कुछ है”, “२१ दिनों में आम” इत्यादि पुस्तकें बाजार में उपलब्ध होने लगती हैं| देखते ही देखते पूरा समाज पानी में से आम निकालने, बाकी लोगों को पानी में से आम निकालने के लिए प्रेरित करने तथा उससे जुड़े व्यवसायों में लग जाता है|
कई तरह के विचित्र यंत्रों का निर्माण होने लगता है, जो जितना बड़ा यन्त्र बनाता है उसे उतना ही अधिक सम्मान मिलने लगता है| यन्त्र बनने की होड़ समाज में लग जाती है| ज्यादा से ज्यादा पानी के नीचे जा सकने वाले यन्त्र, पानी के ऊपर से ही ज्यादा गहरे तक देख सकने वाले यन्त्र, इत्यादि| ज्यादा से ज्यादा लोग इस तरह के यन्त्र बनाने वाले व्यवसायों में संलग्न होने लगते हैं क्योकि इनमें ज्यादा पैसा भी है और सम्मान भी| जो लोग इससे या इससे जुड़े व्यवसायों में लगे रहते हैं उन्हें श्रेष्ट माना जाने लगता है| अब ज्यादा से ज्यादा लोग इन व्यवसायों में आ जाना चाहते हैं| इस होड़ में परस्पर प्रतिद्वंदिता, द्वेष, घृणा, इर्ष्या इत्यादि लोगों में जन्म लेने लगती है, जो समाज में परस्पर विरोध तथा लडाइयों को जन्म देने लगती हैं| लोग कई अलग अलग गुटों/राज्यों/देशों  में बटने लगते हैं और उनमें प्रतिद्वंदिता बनी रहती है| हर गुट/राज्य/देश सबसे पहले और सबसे ज्यादा आम पा लेना चाहता है|
प्रथ्वी पर उपलब्ध अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग यन्त्र उपकरण बनाए में किया जाने लगता है और इसी को प्रगति का आधार भी माना जाने लगता है, जिससे और भी कई समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं| प्रत्येक  गुट/राज्य/देश प्रगति की इस नई परिभाषा की अनुरूपता में प्रगति कर लेना चाहता है| इसके कारण प्राकृतिक संसाधनों की भी प्रथ्वी पर कमी पड़ने लगती है| तरह तरह के यन्त्र उपकरण बनाने के उन्माद में पूरी सभ्यता अपना ख़ुद का ही विनाश करने पर उतारू हो जाती है| कई इस तरह की वस्तुओं का उत्पादन होने लगता है जिनका बोझ प्रथ्वी उठा नहीं सकती| प्राकृतिक व्यवस्था को बनाये रखते हुए वस्तुओं का उत्पादन संभव तो है लेकिन कोई उनमें लगना नहीं चाहता, क्योकि उत्पादन की उस विधि में ना तो पैसा है और ना ही सम्मान| और अगर कुछ लोग सही विधि से उतपादन के लिए कुछ करने की सोचते भी हैं तो उनके पास अपना ख़ुद का गुजर बसर करने के लिए भी संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाते और फिर उनके द्वारा लिया कदम उनके ख़ुद के लिए अभिशाप बन जाता है|
साथ ही साथ एक दूसरी विचार धारा भी जन्म लेने लगती है जिसमें कुछ लोग ये देख लेते हैं की पानी में से आम निकालने का ये अथक प्रयास हम पिछले कई सालों से कर रहे हैं और कुछ हासिल नहीं कर पाये और इस आम को पाने की होड़ के कारण ही ये सब समस्याएं समाज में उत्पन्न हो रही हैं, तो वे लोग प्रस्ताव देते हैं की हमारे अन्दर ये आम को पाने की इच्छा ही हमारे दुखों का कारण है, हमें इस आम को पाने की इच्छा का ही दमन करना होगा! कई लोगों को ये बात सही भी लगती है और वे उस इच्छा को काफ़ी हद तक दबा भी पाते हैं| परन्तु अधिकतम लोगों को तो अभी भी वो आम की परछाई अपनी ओर आकर्षित करती रहती है और वे आम के प्रति अपनी इच्छा का दमन करने में अपने आप को असमर्थ पाते हैं|
इस तरह से यह दूसरी विचार धारा भी लोगों का काफ़ी कुछ भला नहीं कर पाती| पहली यन्त्र/उपकरणवादी विचारधारा ने तो लोगों को अपने चंगुल में फंसा ही रखा था और उसके परिणाम भी लोग भुगत ही रहे थे|
साथ ही साथ एक चीज़ और भी होती है, कुछ लोगों का इस बात पर ध्यान चला जाता है की ये जो आम हमें पानी में दिख रहा है ये तो केवल परछाई है, असल आम तो नदी के किनारे लगे पेड़ पर लगे हैं| वे लोग उन असल आमों का मजा ख़ुद तो ले ही रहे होते हैं और साथ ही साथ बाकी लोगों को बतलाने का प्रयास करते हैं की तो तुम्हें आम दिख रहा है वो आम नहीं है, आम तो नदी के किनारे लगे पेड़ पर हैं, जो तुम देख रहे हो वो तो केवल उन आमों की परछाई है| पर लोग उन्हें सुनने को तैयार नहीं होते| वे लोग उस आम के पेड़ की तरफ़ ध्यान तक देने को तैयार नहीं होते और केवल उन परछाइयों को ही आम माने रहते हैं और उन्हें पाने का प्रयास करते रहते हैं|
इसी तरह आम पाने का प्रयास चलता है| अधिक से अधिक लोग यन्त्र/उपकरणवादी मानसिकता से अधिक प्रभावित रहते हैं| अधिक से अधिक संसाधनों का प्रयोग होता रहता है और एक दिन धरती पर संसाधन इतने कम हो जाते हैं की इंसान का ख़ुद का रहना धरती पर दूभर हो जाता है| फिर वह इंसान दूसरे ग्रहों पर अपने अस्तित्व की संभावनाओं को खोजने लगता है और ये एक दूसरी होड़ को जन्म देती है|
इस तरह देखते ही देखते एक दिन सब ख़तम हो जाता है, पर किसी के आम हाथ नहीं लग पाता|

Published in:  on September 22, 2008 at 5:59 am Comments (1)