अतृप्ति

हर एक फूल पत्ती में मैं,
तृप्ति ढूंडा करता हूँ,
जब मैं अतृप्त महसूस करता हूँ,
तिनके के सहारे से भी,
अत्यंत आनंद लिया करता हूँ,
जब मैं अतृप्त महसूस करता हूँ|

मोनिटर की स्क्रीन पर मैं,
संदेशों का इंतज़ार किया करता हूँ,
संदेश ना आने पर मैं,
व्याकुल हो जाया करता हूँ,
लोगों को संदेश भेज भेज कर मैं,
अपनी अतृप्ति निकाला करता हूँ|

कोई मिल जाए मुझे,
जो मुझे सुने और समझ जाए,
ऐसी आशा लगाया करता हूँ|
ना मिलने पर किसी के मैं,
अकेले ही घूमने निकल जाया करता हूँ,
जब मैं अतृप्त महसूस करता हूँ|

अतृप्ति के खालीपन मे ये,
मौसम का बदलाव भी मुझे सताता है,
किसी के मुँह मोड़ लेने पर वह
मुझे अपने विरोधी की तरह दिखने लग जाता है|
दुकानों पर खा कर के पकवान,
मैं उस अंतराग्नि को बुझाया करता हूँ|

पूरा संसार मुझे तृप्त करने मैं लगा रहे,
मन मैं जो इच्छा विचार हैं,
वह उसी क्षण पूरे हो जाएँ!
ऐसी निरंतर तृप्ति की मैं उन अनित्य
वस्तुओं से आशा लगाया करता हूँ,
जब मैं अतृप्त महसूस करता हूँ|

ये अतृप्ति की ज्वाला मुझे,
मेरी परतंत्रता का ध्यान दिलाती है,
मेरे अन्दर बसी आसक्तियां,
अपना असल रूप दिखाने लग जाती हैं|
स्वयं पर नियंत्रण रखने मे ही,
मेरी आधी उर्जा चली जाती है|

प्रश्नों के उत्तरों का आभाव नही है,
बस उस अमृत का ही आभाव है,
जो इस अतृप्ति को बुझायेगा|
नदी के उस पार दीखता है वो अमृत मुझे,
पर तैरना नहीं आता यही व्यथा है,
जाने कब ये इंसान उस पार पहुच पायेगा|

यह सब सोच कर के मैं,
अपनी उस अतृप्ति को बड़ा लिया करता हूँ,
जब मैं अतृप्त महसूस करता हूँ|

Published in:  on August 14, 2008 at 10:03 am Leave a Comment

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